युग-युग की कहानियां

शांता रंगाचारी

चित्राकन

पी. खेमराज

अनुवाद

मोहिनी राव

नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

4७83)]व 8]-237-007-2

पहला संस्करण 972 तेइसवीं आवृत्ति 2002 (शक 924)

(6 शांता रंगाचारी, 972 बृ४65 णः 5]] ॥]765 (प्रखव्वां रु, 2.00

निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, ए-5 ग्रीन पार्क नयी दिल्‍ली-006 द्वारा प्रकाशित

मृत्यु से संवाद

राजकुमारी सावित्री पिता के सामने खड़ी थी-सुंदर, सुकुमारी, लेकिन दृढ़-संकल्प। उसके चेहरे पर हठ था। उसके पिता राजा अश्वपति उसके हठीले स्वभाव को खूब जानते थे, लेकिन उसके सामने अपने को विवश पाते थे।

सावित्री ने पिता को याद दिलाया, “आपने कहा था कि मैं अपना पति खय॑ चुन सकती हूं। कहा था न? याद है आपको, पिताजी ? और अब आप अपने वचन से पीछे हट रहे हैं।'' ि

पिता-पुत्री एक दूसरे से कट वचन कह बैठें, इस डर से नारद मुनि बात काटकर बीच ही में बोल उठे, “पुत्री, तुम्हारे पिता अपना वचन नहीं तोड़ रहे हैं। वह मुझसे सत्यवान के बारे में ही पूछ रहे थे जिससे तुम विवाह करना चाहती हो। मैं उनसे बात कर रहा था तो उन्होंने कहा सावित्री को बुलवा लें। वे चाहते थे कि मैं जो कुछ कहूं, वह तुम स्वयं अपने कानों से सुनो।'

“और आप क्‍या कह रहे थे?” सावित्री ने पूछा। सावित्री जानती थी कि

नारद के साथ बहुत सोच-समझ कर बात करनी चाहिए। सावित्री की बुद्धि बहुत तेज थी, लेकिन नारद उससे भी तेज थे। वह देवताओं और मनुष्यों दोनों के ही मित्र, सलाहकार ओर दूत थे। वह जो कुछ भी करते थे वह सब के भले के लिए ही होता। अंतिम परिणाम चाहे जितना सुखद हो, उनके काम प्रायः लोगों को अप्रिय लगते थे। नारद इतने चतुर थे कि कभी-कभी, बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग भी हार जाते थे। नारद के लिए सावित्री के मन में बड़ा आदर था।

नारद ने कहा, “सत्यवान जिससे तुम प्रेम करती हो, बड़े प्रतिष्ठित वंश का राजकुमार है और बहुत योग्य है। उसके नाम से ही उसके सच्चरित्र का पता चलता है। सत्यवान--अर्थात्‌ जो केवल सत्य बोलता है। वह बुद्धिमान है साहसी है, ओर पितृभक्त है। उसके अंधे वृद्ध पिता को उनके एक धोखेबाज संबंधी ने षड्यंत्र रचकर गद्दी से उतरवा दिया था। उनका जन्म तो हुआ था राजसिंहासन पर बैठने के लिए, लेकिन अब जंगल में रहते हैं ओर लकड़हारे का काम करते हैं बेचारे।'

मैं सब कुछ जानती हूं।' तुम ओर भी बहुत कुछ जानती हो शायद,” उसके मन की थाह पाने की

कोशिश करते हुए नारद ने कहा।

“यह तो इस पर निर्भर करता है कि आप ओर क्‍या जानते हैं,” सावित्री ने पैंतग बदला

नारद ने मुस्कराकर मन ही मन सोचा, “यह जरा-सी लड़की मुझे बनाने की कोशिश कर रही है!”

उन्होंने कहा, “मुझे एक और बात मालूम है जो शायद तुम्हें नहीं मालूम | वही बात मैं अभी तुम्हारे पिता को बता रहा था।”

“यही बात कि सत्यवान की जन्मपत्री में लिखा है कि आन से ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जायेगी?”

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इस साहस से राजकुमारी ने ये शब्द कहे कि दोनों श्रोता दंग रह गये!

उसके पिता ने आवेश में आकर कहा, “फिर भी तुम उस युवक से विवाह करना चाहती हो?” उनकी आवाज कांप रही थी।

नारद ने सोचते हुए सावित्री की ओर देखा ओर पूछा, “तुमने कैसे यह मालूम किया, सावित्री ? क्‍या तुम सत्यवान के मां-बाप से मिली थी?”

“हां,” सावित्री ने उत्तर दिया। “उनकी मां बहुत ही धर्मपरायणा हैं। उन्होंने ही मुझे बताया। सत्यवान के जन्म के बाद जिन पंडितों ने उनकी जन्मपत्री बनायी थी, उन्होंने उनके माता-पिता को सावधान कर दिया था। सत्यवान इस बात को नहीं जानते, लेकिन उनके मां-बाप जानते हैं। इतने वर्षों तक उन्होंने इस रहस्य को छिपाये रखा ओर चिंता के भार को चुपचाप सहते रहे।'

नारद ने कहा, 'एक बात बताओ, सावित्री तुम समझती हो कि सत्यवान से विवाह करने पर तुम्हारा भविष्य केसा होगा?

“जी हां, सावित्री ने कहा;

“तुम्हें भय नहीं लगता?'

“दुखी अवश्य हूं, सावित्री ने गंभीरता से कहा, “लेकिन भय नहीं लगता मैं यह नहीं मानती कि ब्राह्मण-पंडितों की गणना के अनुसार ग्रहों की स्थिति द्वारा जन्म और मृत्यु का निर्णय होता है। हम मनुष्य एक-दूसरे के जीवन को प्रभावित करते हैं। यदि में सत्यवान से विवाह करूंगी तो मेरे भाग्य का प्रभाव उसके जीवन पर पड़ेगा और कौन जाने क्या हो। हो सकता है कि होनी को रोका भी जा सके।

सावित्री की बात सुनकर नारद मुनि ने उठते हुए कहा, “इस विवाह में अब रुकावट डालो, अश्वपति। तिलक की तैयारी करो। सावित्री उन्हें प्रणाम करने आयी तो उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर, गद्गदू-कंठ से कहा, राजकुमारी, मैं केवल एक ब्रह्मचारी हूं, लेकिन मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। भगवान से

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प्राथना करूंगा कि तुम्हारा मंगल करें। मेरी कामना है बेटी, कि तुम्हारा साहस सदा सत्यवान की रक्षा करे।”

राजकुमारी उठकर अंदर जाने लगी तो अश्वपति उसकी ओर अपलक देखते रहे और ठंडी सांस भर कर बोले, “सावित्री को लड़का होना चाहिए था। स्त्रियों का इतना कुशाग्रबुद्धि होना अच्छा नहीं। कहीं इसकी प्रखर बुद्धि के कारण ' इसका अमंगल हो।”

नारद ने स्तरेहपूर्ण तिरस्कार से कहा, “इन मामलों में इतने पुराने विचार नहीं होने चाहिए, अश्वपति। जो भी हो, सावित्री की प्रखर बुद्धि लकड़हारे पति, अंधे ससुर ओर बेहद धार्मिक सास के साथ वन में रहने में उसकी अवश्य सहायता करेगी।”'

लेकिन नारद की शंका गलत निकली। सावित्री-सत्यवान का विवाहित जीवन बहुत सुखी था। सावित्री को तो लगता कि जितना सुख वन में है उतना महल में नहीं।

बहुत सवेरे जब पक्षी चहचहाने लगते ओर गऊएं रंभा-रंभा कर अपने बछड़ों को बुलाने लगतीं, सावित्री की आंख खुल जाती। सास-ससुर उसको इतना लाड़-प्यार करते थे कि वह माता-पिता के वियोग को भी सह गयी। सास-ससुर ने ही उसे जप-तप का संयम-नियम समझाया। इस प्रकार सुख ओर स्वाधीनता के वातावरण में दिन निकलते गये ओर सावित्री किशोरी से युवती हो गयी।

सत्यवान की मृत्यु का भय हर समय उनके सुखी जीवन पर छाया रहता था। लेकिन सावित्री और उसके सास-ससुर के व्यवहार से यह जरा भी पता चलता कि यह चिंता उन्हें घुन की तरह खाये जा रही है।

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आखिर काल-दिवस पहुंचा। रोज की तरह सवेरा हुआ। पेड़ों पर चिड़ियां चहचहायीं, गऊएं रंभा-रंभा कर अपने बछड़ों को बुलाने लगीं। सत्यवान के माता-पिता चिंतित, उदास चेहरों से अपना-अपना काम-काज करने लगे। रह-रह कर वे प्रेम से इतने व्याकुल होकर पुत्र की ओर देखते कि सावित्री से सहा जाता ओर वह अपना मुंह फेर लेती। सावित्री भी यंत्र के समान चुपचाप अपना काम कर रही थी। उसमें जेसे कुछ सोचने की शक्ति ही नहीं थी।

सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जंगल जाने को तैयार हुआ तो सावित्री भी उठी।

“मैं आज आपके साथ चलूंगी। चलूं?” उसने पूछा।

“क्यों 27 सत्यवान ने कहा, “आजकल धूप बहुत तेज होती है। और फिर तुम्हारी आदत है इधर-उधर घूमने निकल जाती हो ओर खो जाती हो।”

सावित्री ने मुस्कराने की चेष्टा करते हुए कहा, “आज मैं कहीं नहीं जाऊंगी। बस, बैठी-बेठी आपको देखती रहूंगी।”

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अचानक सत्यवान की मां बोल उठीं, “उसको अपने साथ ले क्‍यों नहीं जाते, बेटा ?

सत्यवान ने हंसकर शरारत भरी आंखों से पूछा, “क्यों मां, आज सवेरे-सवेरे अपनी बहू से छुटकारा पाना चाहती हो?”

मां ने कहा, “नहीं, मैं अपने बेटे को समझाने की कोशिश कर रही हूं कि कभी-कभी पत्नी को दुलार करना चाहिए। इस बेचारी के लिए दिल बहलाने को यहां क्‍या रखा है।''

“तो मैं इसको दुलार करूं, मां? मैं तो इसे हीरे ओर लाल का हार देना चाहता हूं। उसकी जगह जंगल की सैर... रहने भी दो, इससे क्‍या दिल बहलेगा ?

सत्यवान की बात सुनकर सावित्री का दिल डूबने लगा, लेकिन अपनी व्यथा को छिपाकर, हंसकर उसने कहा, “ओह ! हीरे-लाल का हार ! खेर ... आज तो जंगल की सैर करा दीजिए। लेकिन हार किसी किसी दिन लेकर रहंगी, छोड़ूंगी नहीं। याद रखिएगा। आपने वचन दिया हे।''

हंसते-बोलते, एक-दूसरे से बहुमूल्य उपहारों का वायदा करते, लापरवाह प्रसन्न बच्चों की तरह दोनों वन की ओर चले। जब सत्यवान ने माता-पिता को प्रणाम किया तो उनकी आंखें उसके चेहरे से हट नहीं पायीं। वे उसके शरीर पर हाथ फेरते रह गये। सावित्री ने ऐसा बहाना किया मानो उसने कुछ देखा ही हो। उसको डर था कि कहीं आंखों से आंसू बहने लगें। वह बार-बार अपने को समझाती रही, “आज मुझे अपने सारे साहस ओर संयम की जरूरत है। अपने मित्रों, ब्राह्मणों ओर नारद मुनि के आशीर्वाद की जरूरत है। अब मेरा भाग्य मेरे ही हाथों में है।''

जंगल में पहुंच कर सत्यवान ने अच्छी तरह देख-भाल कर काटने. के लिए एक पेड़ चुना, और उसके तने पर कुल्हाड़ी चलाने लगा। सावित्री चारों तरफ

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देखती रही कि कहीं से कोई सांप या बनैला पशु जाए। वह सोच रही थी कि सांप या जंगली पशु के रूप में ही मृत्यु उसके पति पर वार करेगी। कुल्हाड़ी चलाते-चलाते अचानक सत्यवान ने अपना सिर थाम लिया और लड़खड़ाता हुआ पत्नी के निकट आया।

"ओह कितनी भयंकर पीड़ा हो रही है सिर में,” इतना कहना था कि गिरकर वह मूच्छित हो गया।

सावित्री ने तुरंत पति का सिर अपनी गोद में रख लिया ओर इधर-इधर देखने लगी कि कहीं कोई है जिसे सहायता के लिए पुकाय जा सके ? सत्यवान के मूच्छिंत होकर गिरते से सावित्री स्तब्ध होकर ऐसे बैठी रही मानों पत्थर की मूर्ति

फिर अचानक सूर्य को ढंकती एक काली छाया उसके सामने आयी। एक काला अजनबी, काली छाया की तरह उसके सामने खड़ा था। वह झुका और उसका बड़ा काला हाथ क्षण-भर के लिए सत्यवान के कंठ पर आया। सावित्री ने सिर उठाकर देखा, लेकिन छाया हट गयी थी ओर दूर चली जा रही थी। ठहरिए !” सावित्री ने चीखकर कहा और उसके पीछे भागी। “कृपा कर के ठहरिए। मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं। छाया रुक गयी। सावित्री पास चली आयी | उसको आंखें जिस चेहरे को घूर रही थीं वह इतनां गंभीर, इतना सोम्य था कि सावित्री का जरा भय गायब हो गया। वह बिल्कुल शांत और आश्वस्त हो गयी। उसने संकोच के साथ पूछा, क्षमा कीजिएगा। क्‍या आप मृत्यु के

देवता हैं? मैंने आपके बारे में बहुत कुछ सुना हूं,” सावित्री बोलती रही, “लेकिन अभी बहुत कुछ जानना चाहती हूं। एक बात पूछ सकती हूँ ? क्या आप हर एक के प्राणों को ले जाने स्वयं आते हैं?'' क्‍

मृत्यु के देवता ने आगे चलते-चलते कहा, “नहीं, में खास-खास लोगों के लिए ही आता हूं।'

“यदि सत्यवान खास लोगों में थे तो इतनी कम अवस्था में उनका जीवन क्‍यों ले लिया गया? ओर फिर उन्होंने कोई अपराध भी तो नहीं किया था।”

“मृत्यु दंड नहीं है, यमराज बोले।

सावित्री जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगी ताकि उस अजनबी के साथ कदम मिलाकर चल सके।

“मृत्यु अगर दंड नहीं है,'' उसने पूछा, “तो किस जीवन का कब अंत होगा, इसका फैसला कोन करता है? किसी के जन्म के समय ही उसकी मृत्यु का फैसला कर लेना तो अन्याय है। ओर फिर इसमें कोई तर्क भी नहीं है।''

छाया ने रुककर कहा, “यह समझना आसान नहीं है। तुम वापस क्यों नहीं चली जाती, सावित्री? तुम मेरा पीछा क्यों कर रही हो?”

“मैं आपका पीछा नहीं कर रही हूँ,” सावित्री ने भोलेपन से कहा। “मैं तो अपने पति के पीछे-पीछे जा रही हूं।”

“लेकिन यह अब तुम्हारा पति नहीं है।

सावित्री ने धीरे से कहा, “लेकिन मैं तो सोचती हूँ कि प्रेम जीवन और मृत्यु से परे की चीज है। हम कहते हैं कि किसी स्री और पुरुष का आपस में प्रेम हो जाना केवल एक दूसरे को पहचान लेना है। आप पहचान उसी को सकते हैं जिससे पहले परिचय रहा हो। मैंने तो सत्यवान को पहली बार देखते ही पहचान लिया था। हम लोग पहले से ही एक-दूसरे को जानते हैं। और ऐसा दोनों के पूर्व जन्म में ही हुआ होगा। अपने पूर्व जन्म में हम एक-दूसरे को जानते थे, इस रण इस जन्म में हम एक-दूसरे को देखते ही पहचान गये। इसी कारण मैं सत्यवान को नहीं छोड़ सकती। हमारा जन्म-जन्म का साथ है। यदि आप इन्हें ले जायेंगे तो मुझे भी ले जाना पड़ेगा।

मृत्यु के देवता यम कुछ हंसकर बोले, “तुम बहुत हठी हो। तुम्हारा तर्क सुनकर मुझको हंसी आती है। तुम्हारी कोई इच्छा है ? सत्यवान के जीवन को छोड़कर कुछ भी मांगो। मैं दूंगा।'

सावित्री सोचने लगी।

सोचकर उसने कहा, “अच्छी बात है। आप तो जानते हैं कि मेरे ससुर को धोखा देकर उनकी गद्दी छीन ली गयी थी। में सोचती हूं कि इस अन्याय का प्रतिकार होना चाहिए। मुझे आशा है कि आप मुझसे सहमत होंगे।”

_तथास्तु,” यम ने कहा, और जल्दी-जल्दी चलने लगे। कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने मुड़कर देखा कि सावित्री अब भी उनके पीछे रही है।

उसके तलुए कांटों और कंकडों से छिलकर लहूलुहान हो गये थे।

मुस्कराकर उसने कहा, “आप बहुत तेज चलते हैं।'

यम ने उसकी ओर कठोर दृष्टि से देखकर पूछा, “तुम चाहती कया हो, सावित्री यदि तुम अपने पति का जीवन चाहती हो तो तुरंत इसका विचार छोड़ दो क्योंकि यह संभव नहीं है। यम तो अपना वचन तोड़ता है और किसी का जीवन लोटाता है। समझी?

“ओह, यह बात है ?” सावित्री ने बड़ी सोच में सिर हिला कर कहा। “बड़ी दिलचस्प बात है। लेकिन तब तो आपको पक्का विश्वास होगा कि आप जो कुछ करते हैं, ठीक करते हैं। है न?”

“इसमें ठीक ओर गलत का कोई प्रश्न नहीं।'

“अच्छा, सावित्री ने आश्चर्य से कहा, “कितनी अजीब बात है। बचपन से ही कूट-कूट कर मेरे दिमाग में यह बात भरी गयी है कि हमेशा वही काम करना चाहिए जो ठीक हो। गलत काम नहीं करना चाहिए। लेकिन शायद ठीक या गलत यह सब केवल ह* मनुष्यों के लिए है, देवताओं के लिए नहीं।'

“लेकिन मृत्यु की बात अलग है।'

“कैसे? मुझको तो यही ठीक लगता है कि जो बात जीवन पर लागू है वही मृत्यु पर भी लागू होनी चाहिए।”

“तुम हर बात को इस तरह तोड़-मरोड़ देती हो कि वह तर्कपूर्ण लगने लगती है।'

“क्षमा चाहती हूं,” सावित्री ने बड़े विनय से कहा। “मैं अपनी बात को दूसरी तरह कहूंगी। यदि सारा जीवन हम ठीक काम करने का प्रयत्न करते रहते हैं तो यह उचित ही है कि...।'

“ठहरो,'' यम ने कहा। यदि मैं तुम्हें एक वरदान ओर दूं तो मेरा पीछा करना छोड़ दोगी?”

सावित्री ने बड़े हर्ष से ताली बजाकर कहा, “तो क्या आप मुझको एक ओर

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वरदान देंगे? कितने उदार ओर दयावान हैं आप!”

“लेकिन याद रखना। सत्यवान का जीवन मत मांगना।

“नहीं, नहीं,'' सावित्री ने कहा। “जरा सोचने दीजिए। में अपने पहले वरदान में ही कुछ ओर मांगना चाहती थी।'” भोंहें सिकोड़ कर वह कुछ सोचने लगी। फिर जैसे अचानक बात याद गयी हो, उसके कहा, “हां, अपने ससुर के लिए कुछ मांगना चाहती थी जिनका राजपाट आपने कृपा कर के वापस दिलवा दिया। वह अंधे हैं। एक अंधा आदमी राजपाट लेकर क्या करेगा? और प्रजा के लिए अंधा राजा किस काम का भला ?'"

यम ने मुस्कराकर कहा, तुम्हारे ससुर की आंखें बिल्कुल ठीक हो जायेंगी।''

यह कहकर वह चलने लगे तो सावित्री ने फिर कहा, “मुझे बड़ी खुशी है कि मुझे अपने ससुर की याद हो आयी। अगर मुझे उनकी आंखों की बात याद जाती तो जानते हैं उत्तेजना में मैं क्या मांग बेठती ?'

क्या?"

“अपने पिता और अपने ससुर के राज्यों के लिए वैभव ओर सुख | बात यह है कि अब दोनों राज्यों की उत्तराधिकारी मैं ही हूं। अब सोचती हूं हक अच्छा ही हुआ कि मैंने आपसे यह वरदान नहीं मांगा। इन राज्यों को भला बम ओर सुख क्यों दिया जाए? यह तो राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को समृद्ध और सुखी बनाये। है न?''

“हां।'

“राजा की जिम्मेदारियां बहुत बड़ी हैं”, सावित्री ने गंभीरता से सिर हिलाते हुए कहा। “महल में रहना, दरबार लगाना, कवियों और गायकों को सम्मानित करना, ओर कर वसूल करने के लिए कर्मचारियों को राज्य-भर में भेजना, इतना ही थोड़ा होता है राजा का काम ? राजा को यह भो देखना होता है कि कानून का पालन उचित ढंग से हो, ओर उसके कर्मचारी प्रजा को सताएं। उसको

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पड़ोसियों के साथ शांति बनाये रखनी चाहिए, ओर यह देखना चाहिए कि उसके राज्य में कोई ऐसा तो नहीं है जिसके पास भोजन, कपड़ा या रहने की जगह नहीं है। इसमें भी जरूरी यह है कि लोगों को बोलने की आजादी हो, और वे राज्य-व्यवस्था की आलोचना निर्भय होकर कर सकें जिससे कि राजा स्वेच्छाचारी बन जाये।"

इस बुद्धिमती राजकुमारी की बातें सुनकर यम मन ही मन उसको प्रशंसा करते हुए बोले, “बिल्कुल ठीक कह रही हो तुम। न्याय और स्वाधीनता की परंपरा पुस्तकों में लिखे कानूनों से कहीं ज्यादा बड़ी है।'

सावित्री ने कहा, “और इसके लिए यह आवश्यक है कि राजाओं के वंश बिना किसी विध्न-बाधा के चलते जायें, उत्तराधिकार का सिलसिला कहीं टूटे। है न?

“अवश्य, यम ने कहा। “अगर उत्तराधिकार के सिलसिले में गड़बड़ी हुई तो अराजकता फैलेगी, संबंधियों में आपस में युद्ध होगा।'

सावित्री ने अचानक मौन साध लिया। उसके चेहरे पर निराशा और उदासी छा गयी, उसके कंधे झुक गये और उसकी सुंदर आंखों से आंसू टपक पड़े।

यम ने आश्चर्य से पूछा, क्या हुआ, सावित्री ?

“आप इतने बुद्धिमान हैं, सर्वज्ञ हैं,'' सावित्री ने ठंडी सांस भर कर कहा। ''मुझे विश्वास है कि आपने मेरे मन की बात समझ ली होगी।'

यम भौहें सिकोड़कर सोचने लगे। सावित्री क्या सोच रही है यह समझने की कोशिश करना वैसा ही था जैसे तूफान में हवा को दिशा का अनुमान लगाना।

सावित्री ने धीरे से कहा, “मैं सोच रही थी कि मेरे बाद इन दोनों राज्यों का कोई शासक नहीं होगा। मेरे पिता और मेरे ससुर के वंशों का क्या होगा ? मेरी मृत्यु के बाद कितनी अराजकता फैलेगी, संबंधियों में युद्ध होंगे--यही शब्द थे आपके ? सड़कों पर रक्त की नदियां बहेंगी, नगर उजाड़ हो जायेंगे, फसलों को

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काटनेवाला कोई होगा घर-घर से स्त्रियों और बच्चों का रोना सुनायी देगा... ।''

“ठहरो, यम ने उसको रोक कर कहा। ' ऐसा नहीं होने पायेगा। मैं तुमको वरदान देता हूं। तुम्हारे सौ पुत्र होंगे और वे दोनों वंशों को चलायेंगे।”

जैसे ही यम के मुख से यह शब्द निकले, सावित्री का सारा रूप ही मानों बदल गया। उसका चेहरा खुशी से चमकने लगा, झुके कंधे तन गये, ठंडी सांसें और आंसू मानों जादू से गायब हो गये | रानियों की-सी शान से सुंदर राजकुमारी यम के सामने सिर उठाये खड़ी थी।

उसने कहा, “मुझे दुख है कि मेरे कारण आपको अपनी परंपरा तोड़नी पड़ेगी।”'

“कौन-सी परंपरा?” यम ने सतर्क होकर पूछा।

_यही कि यम कभी किसी का जीवन नहीं लौटाते। आपने मुझको सौ पुत्रों का वरदान दिया है न? यदि आप मेरे पति को ले गये तो मेरे पुत्र कैसे होंगे ?

यम ने हार स्वीकार की। जब दोनों जल्दी-जल्दी जंगल में वापस जा रहे थे तो

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यम ने कहा, “नारद ने मुझसे कहा था कि मैं सत्यवान को लेने स्वयं जाऊं। तभी मुझे समझ जाना चाहिए था कि इसमें नारद की कोई चाल है!''

कहने की आवश्यकता नहीं कि यमराज ने जो-जो वरदान सावित्री को दिए थे, सब पूरे हुए। सत्यवान आंखें मलता हुआ उठ बैठा मानों लंबी नींद से जगा हो। उसने सावित्री को बताया कि उसने एक विचित्र सपना देखा कि वह किसी काले अजनबी के साथ किसी लंबी यात्रा पर जा रहा है। सत्यवान के पिता को आंखें भी मिल गयीं और खोया हुआ राजपाट भी। सावित्री को हीर ओर लाल का कीमती हार भी मिला।

भाग्य ने पलटा खाया। चारों तरफ खुशियां मनायी जाने लगीं। खाने-पीने, नाच-गाने की धूम मच गयी। जब धूम-धड़ाका खत्म हुआ ओर उत्साह ठंडा पड़ा तो एक दिन अश्वपति ने सावित्री को अलग बुलाकर पूछा, “मुझे समझ नहीं आता बेटी, कि यमराज से टक्कर लेने का साहस कैसे हुआ तुमको ?”

सावित्री ने मुस्कराकर कहा, “पिताजी, सत्यवान की माताजी से जब मैं मिली तो उन्होंने मुझे उनकी जन्मपत्री और पंडितों की भविष्यवाणी के बारे में बताया। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनमें जो सबसे विद्वान पंडित थे उन्होंने बताया था कि मृत्यु से अधिक शक्तिशाली वस्तु सत्यवान की मृत्यु को टाल सकेगी। इसी से मुझे आशा बंधी ओर साहस हुआ। मेरे पास मृत्यु से अधिक शक्तिशाली चीज थी पिताजी--मेरा प्रेम

आज

सात दिनों का पहरा

प्राचीन काल में राजा लोग केवल शोक के लिए ही शिकार नहीं करते थे। बनैले पशुओं को खत्म करना भी उनका उद्देश्य था ताकि वे वानप्रस्थियों को परेशान करें। जब कभी कोई राजा शिकार पर जाता तो दरबारियों, सैनिकों ओर सेवकों का बड़ा दल भी उसके साथ होता।

महाभारत के वीर नायक अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित एक दिन एक हिरन का पीछा कर रहे थे। निशाना बांधकर तीर जो उन्होंने चलाया तो हिरन घायल हो गया, लेकिन मरा नहीं। शिकार का नियम है कि जानवर की जान ले लो, मगर उसे पंगु बना कर मत छोड़ दो। किसी जानवर को घायल ओर पीड़ा से छटपटाता छोड़ देना अधर्म माना जाता था ओर अब भी माना जाता है। जब हिरन घायल हो गया तो राजा उसको मारकर कष्ट से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से उसका पीछा करते-करते जंगल के बिल्कुल भीतर पहुंच गये। उनके साथी कहीं पीछे छूट गये थे। राजा थक गये थे। उनको बड़े जोरों से भूख ओर प्यास लग रही

थी। लेकिन उन्होंने संकल्प कर रखा था कि जब तक हिरन को पीड़ा से छुटकारा नहीं दिला देंगे, वापस नहीं लोटेंगे।

अचानक राजा ने देखा कि पेड़ों के बीच एक खाली स्थान है। वहां एक वृद्ध ब्राह्मण गऊओं को सानी-पानी दे रहे थे। राजा ने उनके पास जाकर पूछा, “ब्राह्मण देवता, मैं अभिमन्यु का पुत्र और इस राज्य का शासक हूं। मैं एक घायल हिरन की तलाश में हूं। वह इस ओर तो नहीं आया ? आपने तो नहीं देखा ?''

ब्राह्मण सन्‍्यासी का नाम शमीक था। संयोग से वह उनके मौन रहने का दिन था। उन्होंने राजा के प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। ब्राह्मण के उत्तर देने पर राजा को पहले तो आश्चर्य हुआ, फिर उन्होंने सोचा कि शायद वृद्ध ब्राह्मण को सुनायी नहीं देता, और उन्होंने ऊंची आवाज में फिर अपना प्रश्न दोहराया। शमीक राजा की ओर देखते रहे लेकिन इस बार भी उत्तर नहीं दिया। राजा ने इतनी देर में यह तो जान लिया था कि सनन्‍्यासी बहरे नहीं हैं, क्योंकि इसी बीच एक गाय ने दूध दुहने की बाल्टी को लात मारी और उसकी आवाज सुनकर ब्राह्मण ने फुर्ती से बाल्टी को थाम लिया और उसको उलटने से बचा, लिया।

अब तो राजा को बहुत क्रोध आया। उन्होंने समझा कि ब्राह्मण बहुत धृष्ट है। एक सन्यासी की यह मजाल कि राजा के प्रश्न का उत्तर दे ? राजा ने चीखकर कहा कि यदि उन्होंने उसके प्रश्न का उत्तर दिया तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। फिर भी सन्‍्यासी केवल राजा की ओर दुखभरी दृष्टि से ताकते रहे। बोले कुछ भी नहीं।

क्रोध॑ में राजा आपे से बाहर हो रहे थे। उन्होंने इधर-उधर देखा कि किस

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तरह उस धृष्ट ब्राह्मण को अपमानित करें। अचानक उनकी दृष्टि पास ही पड़े एक मरे हुए सांप पर पड़ी। तुरंत ही शाही तलवार म्यान से निकली और बिजली की तरह लपक कर मरे हुए सांप को नोक से उठा लिया। दूसरे ही क्षण सांप हवा में उछला ओर ब्राह्मण के गले में जा लिपटा।

राजा हंसे ओर इस प्रतीक्षा में खड़े रहे कि ब्राह्मण शमीक कुछ कहेंगे, शायद शाप भी दे दें।

लेकिन शमीक ने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर दुख का भाव भी उसी प्रकार बना रहा। राजा लज्जित होकर लौट पड़े।

लेकिन एक तीसरा व्यक्ति भी वहां उपस्थित था जो चुपचाप खड़ा यह सब कुछ देख रहा था। वह थे कृश, शमीक के पुत्र श्रृंगी के मित्र लेकिन राजा या शमीक दोनों में से किसी को यह पता नहीं था। राजा के लोटने के बाद कृश श्रृंगी को यह समाचार देने भागे।

पूछा, “तुमने उस दिन कहा था कि जंगल- वासियों के लिए सब से पहले भगवान हैं ओर फिर राजा। कहा था न?

श्रृंगी दुर्लभ जड़ी-बूटियां जमा किया करते थे। अपना काम करते हुए उन्होंने अनमने भाव से कहा, “हां, कहा तो था।'

“यदि राजा हमारी परवाह करे, तो हम उसके स्वामीभक्त क्यों हों?

श्रृंगी ने पूछा, “तुम राजा परीक्षित की ही बात कर रहे हो न? वह वानप्रस्थियों का कभी अपमान नहीं करेंगे। क्यों करेंगे भला?

श्रृंगी के मित्र ने, जो कुछ-कुछ शरारती थे, चालाकी से कहा, “मान लो में तुमसे यह कहूं कि मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा, तो?

“तो भी मैं तुम्हारा विश्वास नहीं करूंगा,” श्रृंगी ने तुरंत जवाब दिया।

“अगर तुम अपनी आंखों से इसका प्रमाण देखो तो?

श्रृंगी ने खीझकर कहा, “कैसा प्रमाण? पहेलियां क्यों बुझा रहे हो? साफ-साफ क्‍यों नही कहते क्या बात है? तब शायद मैं उस किस्से को समझ सकूं जो तुम सुनाना चाह रहे हो।'

“यह कोई किस्सा-कहानी नहीं, सच बात है,'' श्रृंगी के मित्र ने उनका हाथ पकड़कर जंगल की ओर खींचते हुए कहा। वे दोनों वहां पहुँचे जहां शमीक समाधि लगाये बैठे थे। मरा हुआ सांप अभी तक उनके गले में लिपटा हुआ था।

“ओरे! पिताजी के गले में मरा सांप लिपटा है!” यह कहते हुए श्रृंगी आगे की ओर लपके। लेकिन उनके मित्र ने उन्हें पीछे खींच लिया।

“हां, यह मरा हुआ सांप ही है”, उन्होंने व्यंग से कहा। “हमारे महाराज, हमारे प्रभु और कृपालु रक्षक राजा परीक्षित ने इसे तुम्हारे पिताजी के गले में

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डाला। मैंने स्वयं देखा। और जानते हो तुम्हारे पिता का अपराध क्‍या था जिसके लिए उन्हें यह दंड दिया गया? क्योंकि राजा ने किसी घायल हिरन के बारे में कुछ पूछा ओर तुम्हारे पिता ने उत्तर नहीं दिया। राजा उनके ऊपर खूब बिगड़े-मैंने स्वयं सुना। उसके बाद अपनी तलवार की नोक से इस मरे सांप को उठाकर तुम्हारे पिता के गले में डाल दिया। लेकिन मानना पड़ेगा--क्या हाथ की सफाई थी, वाह! ऐसा अचूक निशाना साधा कि सांप ठीक-ठीक तुम्हारे पिता के गले में लिपटा! जरा भी चूक नहीं हुई। मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा।”

“लेकिन, श्ृंगी ने चकित होकर पूछा, “तुमने आगे बढ़कर महाराज को बताया क्‍यों नहीं कि आज पिताजी के मौन रहने का दिन है?”

“मेरा दिमाग थोड़ा ही खराब था?" कृश ने मुंह बनाकर उत्तर दिया। महाराज बड़े क्रोध में थे उस समय और हाथ में नंगी तलवार थी ? तलवार मेरी ही गर्दन पर चल जाती तो?”

श्रृंगी ने प्रेम ओर गर्व से अपने वृद्ध पिता की ओर देखा। मरा सांप देखकर उनको क्रोध रहा था।

महाराज ने मेरे पिता का अपमान करके बहुत बुरा किया," उन्होंने कहा। _ क्या वह इनके मुख पर यह तेज नहीं देख सके ? इनकी आंखों में गरिमा नहीं देख सके?”

राजा लोग यह सब कुछ नहीं देखते,'' राजाओं के बारे में अपनी सम्मति को इस संक्षिप्त उत्तर में बता दिया कृश ने।

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पिता के दुबले-सूखे शरीर पर राजा के अपमानजनक आचरण के प्रमाण को श्ृंगी जितना ही देखते, उनका क्रोध उतना ही बढ़ता जाता। आखिर उनसे अब और अधिक नहीं सहा गया ओर उनका सारा क्रोध शाप बनकर उनके मुंह से फूट पड़ा, “भले ही राजा हो, लेकिन वह नीच है जिसने मेरे महान पिता के गले में मरा हुआ सांप डाला। उसने मेरे पिता का ही अपमान नहीं किया, इन सारे वानप्रस्थियों का अपमान किया है जिन्होंने राजा को कभी कोई हानि नहीं

पहुंचायी। मैं राजा को शाप देता हूं। कुरु वंश के उज्वल नाम को कलंकित करने वाले इस अहंकारी राजा की, आज से सात रोज के अंदर, सर्पराज तक्षक के काटने से मृत्यु हो जायेगी।” से भयानक शाप के शब्द श्रृंगी के मुख से निकले ही थे कि उनके पिता ने विचलित होकर अपनी समाधि तोड़ दी और भय से अपने पुत्र के मुंह की ओर देखने लगे। उनके बेटे ने क्रोध में आकर जो कुछ कह डाला था उससे मानों उन अपात-सा हुआ। अपने मौन को तोड़ते हुए, आहत स्वर में बोले, “अशंगी, ' मेरे बेटे, तुमने यह क्या कर डाला? तुमने नेक राजा परीक्षित को शाप दे डाला

रख पाने के कारण कैसा संकट आयेगा, कैसी अराजकता फैलेगी। तुमने राजा परीक्षित को शाप नहीं दिया, सारे राज्य को शाप दे डाला है, श्रंगी। किसी भी दशा में ऐसा करना बहुत ही बुरा होता। राजा परीक्षित के साथ ऐसा करना तो ओर भी बुरा है क्योंकि वह दंड के भागी नहीं हैं।"

श्रृंगी का क्रोध उतर चुका था। पिता की बात सुनकर वह पश्चात्ताप से सिर झुकाये खड़े रहे, फिर रोने लगे।

तरदान पा लिया है कि तुम्हारे मुख से निकली हर बात सच होकर रहेगी। यह जान कर ही मैंने तुम्हें बार-बार समझाया था बेटे, कि बोलने से पहले सौ बार सोच लिया करो।”

वृद्ध शमीक विचार में डूबे बैठे रहे। फिर अचानक उठकर बोले, “गौरमुख को मेरे पास भेज दो। उसे में तुरंत राजमहल भेजूंगा कि वह महाराज को शाप

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की बात बताकर उन्हें सावधान रहने के लिए कह दे।'

राजा परीक्षित ने चुपचाप गौरमुख का संदेश सुना।

वह दुखी होकर बुदबुदाये, “तो वह सन्‍्यासी के मौन का दिन था! मुझे समझ

हे ०) १-3 7 था < |; जाना चाहिए था। दोष मेरा था। लेकिन यह पचास उन च्ण पर शमीक की दया है जो उन्होंने मुझको /॥॥/2८/0४0७४- 2९ हे

सावधान कर दिया। कृपा करके उन्हें मेरा प्रणाम कहना ओर कहना कि मैं उनका कृतज्ञ

कह

हृ।

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यह कह कर गोरमुख को तो उन्होंने तुरंत विदा कर दिया और सलाह के लिए अपने मंत्रिमंडल को बुला भेजा। मंत्रियों के आने से पहले राजा ने कश्यप को संदेश भिजवाया कि वह तुरंत महल में जायें। कश्यप ब्राह्मण थे ओर सबसे अधिक विषेले सांप के काटे का भी इलाज कर सकते थे।

मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद शिल्पी ओर राज-मिस््री महल में बुलवाये गये ओर रात ही रात में एक अजीब-सी इमारत खड़ी कर दी गयी-बस, एक ऊंचे खंभे पर एक बड़ा कमरा। इसी कमरे में राजा रहने लगे-खंभे के नीचे ओर कमरे के बाहर सशख्र संतरी खड़े थे। उनको कठोर निर्देश था कि कोई कीड़ा भी कमरे के अंदर घुसने पाये। परिवार के लोगों ओर मंत्रियों को छोड़, राजा के पास जाने की अनुमति किसी को नहीं थी।

जब कश्यप राजा का आदेश पाकर जल्दी-जल्दी महल की ओर जा रहे थे तो रास्ते में एक बूढ़ा ब्राह्मण बेठा दिखा। वह बहुत ही दुखी लग रहा था।

कश्यप ने पूछा, “क्या हुआ, भाई? सड़क के किनारे इस तरह दुखी क्‍यों बैठे हो?''

ब्राह्मण ने कहा, “वही कारण है जो आपको इस सड़क पर लिये जा रहा

है।''

“वही कारण है?” चकित होकर कश्यप ने पूछा, “पर मैं तो महाराज के दर्शनों के लिए जा रहा हूं। क्या तुम भी वहीं जा रहे हो?”

हां!।

“राजा को धमकी दी गयी है कि वे नागराज तक्षक द्वारा काटे जायेंगे। उन्हीं की चिकित्सा के लिए मुझे बुलवाया गया है। लेकिन भला आपको क्‍या काम वहां ?'

“मैं उनको मारने जा रहा हूं।”' कहते ही ब्राह्मण ने अपना असली रूप धारण कर लिया। असल में वह सर्पराज तक्षक था।

“यह तो अजीब स्थिति है,' कश्यप ने कहा। “तुम उन्हें मारने जा रहे हो ओर मैं जिलाने। हम साथ-साथ चलें या अलग-अलग?”

तक्षक ने पूछा, “क्या आपको विश्वास है कि आप मेरे विष से राजा को बचा सकेंगे?!

“हां,” कश्यप ने बिना किसी संकोच के कहा।

“साबित कीजिए, तक्षक ने चुनौती दी। “मैं इस पौधे को डसता हूं। देखें आप इसे फिर से जिला सकते हैं या नहीं।”

यह कहकर सर्पराज ने अपना मुंह खोला ओर पोधे को डसकर उसकी जड़ में गहराई तक अपना विष फैला दिया। कुछ क्षणों में योधा इस प्रकार भस्म हो गया मानों अंदर की आग से जल गया हो। अपने काम से बहुत संतुष्ट होकर तक्षक ने कश्यप से कहा, “चलिए, अब अपनी शक्ति आजमाइए।'

कश्यप ने मुट्ठी-भर राख उठा ली, और प्रार्थना की मुद्रा में आंखें मूंद कर, उसमें हल्की-सी फूंक मारी। फिर राख को उसी जगह गाड़ दिया जहां से उसे उठाया था। कुछ ही देर में वहां हरा अंकुर निकल आया, फिर उसमें दो हरी पत्तियां फूट निकलीं | फिर हरा तना बढ़ने लगा, उसमें नयी-नयी पत्तियां निकलने लगीं और थोड़ी ही देर में पोधा वेसा ही हो गया जेसा पहले था।

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तक्षक पहले तो घोर आश्चर्य से यह सब कुछ देखता रहा, फिर हार मान गया। इस प्रकार की चीज उसके लिए नयी नहीं थी। वह कई साधु-सन्यासियों से मिलता रहता था जो ऐसे करिश्मे करते थे और प्रार्थना के बल पर ही चमत्कार कर दिखाते थे।

तक्षक ने कश्यप से कहा, “मैं आपकी शक्ति मानता हूं। लेकिन राजा परीक्षित के मामले में इसका प्रयोग मत कीजिएगा। इसका कारण है।''

“क्या कारण है?” कश्यप ने पूछा।

“पहले मैं आपसे एक प्रश्न पूछता हूं,” उसने कश्यप से कहा। “क्या आप किसी की होनी में दखल देना उचित समझेंगे?””

“नहीं, उचित तो नहीं समझता। लेकिन यह होनी नहीं, अभिशाप है जो होनी में दखल दे रहा है।”

“नहीं, आपका विचार गलत है,'” तक्षक ने कहा। ““मैं राजा को समय से

“ले मारने के लिए नहीं जा रहा हूं। मैं तो मृत्यु को बुलाने जा रहा हूं क्योंकि

उनके भाग्य में यही लिखा है। मुझे यमराज ने भेजा है--जन्म और मृत्यु के लेखे के अनुसार श्रृंगी ने जो कुछ कह डाला वह शाप नहीं, भविष्यवाणी थी।'”

कश्यप गहरे विचार में डूबे खड़े रहे। “तो क्या राजा परीक्षित के भाग्य में लिखा है कि वे सात दिन के भीतर ही मर जायेंगे?'' उन्होंने पूछा, ''श्रृंगी ने शाप दिया होता तो भी क्‍या यही होता?''

“देवताओं ने यही उनके भाग्य में लिखा था। मैं तो केवल मृत्यु-देवता का दूत हूं, समय से पहले ही किसी को समाप्त कर देने का साधन नहीं।'

“तब तो मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा, ' यह कहकर कश्यप अपने आश्रम वापस चले गये।

तक्षक बड़ी देर तक राजा के कक्ष में घुसने की तरकीब सोचता रहा। श्रृंगी को भविष्यवाणी के सातवें दिन उसे एक तरकीब सूझी। उसने झटपट अपने कुछ सर्प मित्रों को बुला भेजा ओर उन्हें आदेश दिये।

उसने कहा, “यह काम धोखे से ही किया जा सकता है। राजा कः रक्षा का इंतजाम बहुत पक्का है।'

उस समय राजा परीक्षित, उनके परिवार के लोग और उनके दरबारी इस बाद की खुशी मना रहे थे कि छह दिन बिना किसी संकट के टल गये। सात दिन भी समाप्त होनेवाला था। सूर्यास्त के साथ-साथ शाप का भी अंत ह! जायेगा, और दिन डूबने को कुल एक घंटा बाकी था।

उस दिन काफी संध्या बीते कुछ साधु-सन्यासी खंभे के नीचे खड़े दिखायी दिये। एक ने प्रहरियों से कहा, “हम फल-फूल की भेंट लेकर महाराज क्ने आशीर्वाद देने बहुत दूर से आये हैं।'

प्रहरियों ने सन्‍्यासियों के कपड़ों ओर फल-फूल की टोकरी की अच्छी तरह तलाशी ली। जब संदेह की कोई बात दिखायी दी तो उन्हें राजा के पास जाने दिया। उन्होंने सोचा, शाम का समय करीब-करीब बीत चुका है, राजा को अगर ये सन्‍्यासी आशीर्वाद देने गये तो कोई हर्ज नहीं। सन्यासियों ने फल-फूल की टोकरी राजा को भेंट की, उन्हें आशीर्वाद दिया और बाहर चले गये। जंगल मे

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पहुंच कर सन्यासियों ने अपना सर्प का असली रूप धारण कर लिया ओर जंगल की हरियाली में गायब हो गये।

सूर्यास्त का समय हुआ। राजा के कक्ष में खुशियां मनायी जा रही थीं। बस सर देर ओर, फिर शाप का समय निकल जायेगा, ओर राजा को नयी आयु मिलेगी।

राजा ने अपने परिवार और मंत्रियों को बुलाकर कहा, “सूरज डूब रहा है। आओ, हमारे साथ ये स्वादिष्ट फल खाओ जो कृपालु सन्यासी दे गये हैं।''

दरबारियों ने हाथ बढ़ाकर अपनी-अपनी पसंद का फल उठा लिया। राजा का हाथ एक रसीले आम पर पड़ा। उन्होंने आम चूसा, बड़ा ही स्वादिष्ट था। कुछ देर बाद उन्होंने देखा कि उसकी गुठली में एक नन्‍्हा सा कीड़ा है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। प्रायः रसभरे आमों की गुठालियों में कीड़े निकल आते थे। राजा ने खिड़की से बाहर अस्त होते हुए सूर्य को देखा और हंसकर उस नन्हे काले कीड़े को लक्ष्य करके बोले, “अब तक्षक के आने का समय नहीं रहा। बोलो नन्हे कीड़े, तुम जानते हो कि तुम्हारा राजा अपने काम में असफल क्‍यों हो गया? लेकिन तुम्हें भला क्या मालूम? इसका उत्तर तो तक्षक ही दे सकता है।''

इतना कहना था कि राजा की भय से फैली आंखों ने देखा कि वह नन्हा-सा काला कीड़ा अचानक बढ़कर एक बड़ा शानदार नाग बन गया। जैसे-ही सूर्य पश्चिम में डूबा, तक्षक ने अपना विशाल फन फैलाया और राजा परीक्षित को तुरंत डस लिया।

उपमन्यु ने सबक सीखा

बहुत, बहुत दिन हुए, धौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके आश्रम में अनेक बालक पढ़ा करते थे। उनमें से एक का नाम था उपमन्यु। उपमन्यु और दूसरे बालक गुरुजी के साथ आश्रम में ही रहते थे और शिक्षा ग्रहण करते थे।

आश्रम के नियम बड़े ही कठोर थे। आज्ञाकारिता के बरे में तो बड़ा ही कठिन नियम था। गुरुजी के प्रत्येक आदेश का पालन आंखें बंद करके करना होता था। प्रश्न या किसी प्रकार की शंका करना मना था। इसी प्रकार दूसरा कठोर नियम था भोजन के बरे में। आश्रप के विद्यार्थी बालक निकट के गांवों से भिक्षा में पका-पकाया भोजन ले आया करते थे। वे जो कुछ लाते गुरुजी के आगे रख देते। फिर गुरुजी सबको भोजन बांटते और उसी में से अपने लिए भी निकाल लेते। रोज का यही नियम था।

आश्रम के अहाते में फलों के बाग थे और दूध के लिए कई गऊएं भी थीं।

बालको को दो विषय सिखाये जाते थे-धर्म और युद्ध की कला। जो लड़के बड़े होकर आचार्य या पुरोहित बनना चाहते थे, वे वेद आदि का अध्ययन करते

ओर धार्मिक संस्कारों, जैसे विवाह, यज्ञोपवीत, यज्ञ, श्राद्ध आदि कराने की विधि और मंत्रोच्चार सीखते थे। जो लड़के सैनिक बनना चाहते थे वे शख््र-विद्या और युद्ध के नियम आदि सीखते थे। आश्रम के गुरु केवल शिक्षक ही नहीं, वे बालकों के माता-पिता भी थे। लड़कों के मां-बाप उन्हें गुरुजी की देख-रेख में छोड़ जाते थे ओर वे उन्हीं के समान बड़े प्रेम ओर ममता से अपने विद्यार्थियों की देखभाल किया करते थे' वे इसका पूरा ध्यान रखते कि उनके मस्तिष्क का ठीक विकास हो, साथ उनके चरित्र का निर्माण भी ठीक हो ओर शरीर भी निरोग रहे। गुरुजी लड़कों की आदतों पर कड़ी दृष्टि रखते। अनुशासन के बारे में तो वे बड़े कठोर थे। कोई बालक बीमार पड़ जाता तो तन-मन से उसकी सेवा करते, लेकिन उससे कोई अपराध हो जाता तो कड़ी से कड़ी सजा भी देते। ऐसा था उनका नियम | उनके आदेशों के बारे में प्रश्न करने का साहस राजा को भी नहीं था। हे एक दिन धोम्य ने उपमन्यु को बुलाकर कहा, “बेटा उपमन्यु, राजा एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं। मेरी इच्छा है कि तुम कुछ दिन उनके पास जाकर रहो। तुम उनकी सहायता करना ओर देखना कि पंडित लोग किस प्रकार अपना काम करते हैं। उपमन्यु खुशी-खुशी राजा के महल की ओर चल पड़ा। उसे वहां राजा की खास सेवा में नियुक्त

किया गया। उपमन्यु बड़ा ही परिश्रमी ओर हंसमुख बालक था, इस कारण सभी लोग उससे बहुत प्रसन्न थे। जब कुछ दिनों बाद वह अपने आश्रम में लोटा तो गुरुजी ने उसे बुल भेजा।

गुरुदेव ने पूछा, “बेटा उपमन्यु, क्या तुम इतने दिनों तक उपवास करते रहे? '

“नहीं तो, गुरुदेव,” उपमन्यु ने चकित होकर उत्तर दिया।

“मेरी भी यही धारणा थी।”' गुरुदेव ने कहा, “तुम काफी हृष्ट-पुष्ट लग रहे हो। तुमने महल के बढ़िया-बढ़िया पकवान छककर तो नहीं खाये?

“नहीं, गुरुदेव। मैंने महल के पकयान नहीं खाये। सदा की तरह अपना भोजन गांव से ही मांग कर लाता था। गांव महल से तीन मील दूर ही तो है।'

गुरुजी ने कहा, “लेकिन मैंने तो तुम्! आश्रम में भोजन लाते नहीं देखा।

उपमन्यु को सहसा याद आया कि आश्रम के नियम के अनुसार उसे सारा खाना गुरुजी के आगे लाकर रख देना चाहिए था। उसने अपना माथा ठोक कर भूल स्वीकार की ओर गुरुदेव से क्षमा मांगी।

उस दिन उपमन्यु ने भिक्षा में मिला सारा भोजन लाकर गुरुजी के आगे रख दिया। उन्होंने खाना रखवा लिया ओर इशारे से उसको चले जाने को कह दिया। उपमन्यु सारा दिन प्रतीक्षा करता रहा लेकिन किसी ने उसको खाना नहीं दिया। वह भूखा ही सो गया।

दो दिन बाद धौम्य ने उपमन्यु को फिर बुला भेजा। उन्होंने सोचा कि भूख के

मारे वह अधमरा-सा हो गया होगा। लेकिन उनको देखकर आश्चर्य हुआ कि लड़का पहले की ही तरह चुस्त ओर स्वस्थ लग रहा है।

धोम्य ने कहा, “उपमन्यु मैंने दो दिन तक तुम्हारा लाया हुआ सारा भोजन रखवा लिया ओर तुमको भूखा रखा। मैंने सोचा था कि तुम भूख के मारे कमजोर हो गये होगे। लेकिन तुम तो वैसे ही चुस्त हो ओर पहले की ही तरह दौड़-भाग कर रहे हो। इसका क्‍या रहस्य है?”

“गुरुदेव !,' उपमन्यु ने उत्तर दिया, “में गांव में दोबारा भिक्षा मांगने जाता हू।ः

उसका उत्तर सुनकर धोम्य अप्रसन्न हुए। “तुमने फिर मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया? मैंने कितनी बार बताया है, गांव से दिन में केवल एक बार भोजन लाया जायेगा। बताया था न? उत्तर दो, उपमन्यु!”'

“हां, गुरुदेव !,'' उपमन्यु ने क्षीण स्वर में कहा। “भूख के मारे में यह भूल गया था।

धोम्य ने गंभीर स्वर में कहा, “तुमको ध्यान रखना चाहिए कि